
क्या आप ने कभी दीवार से हार्न बजाने की आवाज सुनी है या फिर कभी आप के कांवकांव करने पर आसमान में कौवे इकट्ठे हुए हैं. आप सोच रहे होंगे कि यह सिर्फ फिल्मों में होता है, पर यकीन मानिए एक ऐसा शख्स है, जो यह सब कर सकता है. पर किसी हिन्दी फिल्म का हीरो नहीं है, वह है बनारस के दूल्हेपुर गांव में दुपट्टे रंगने वाला सफीक रंगरेज.
सफीक 80-90 तरह की आवाजें अपने मुंह से निकाल सकता है. चाहे गाय, बकरी, मोर, घुंगरु, गाड़ी का हार्न, हैलिकोप्टर, रेल, आरकैस्ट्रा के ड्रम की आवाज हो या फिर सालों से बेकार पड़े किसी टेप की वह इतनी सफाई से सारी आवाजें निकालता है कि बस पूछिए मत. लेकिन इतने अच्छे हुनर के होते भी सफीक गरीबी में जी रहा है. बनारस का नाम ऊंचा करने की उस की इच्छा को सरकार ने अनसुना कर दिया है. वैसे भी भारत में कहां किसी गरीब को अपने हुनर के सहारे बढऩे का अधिकार है. गरीबों का बस एक ही काम है यहां, अपने दोनों हाथों के इस्तेमाल से दो जून की रोटी कमाना.
पिछले 8 सालों से सफीक रंगरेज अपने इस हुनर के बल पर लोगों को हंसाने के साथसाथ हैरान कर देता है. दातों तले उंगली ला देने वाले इस हुनर के लिए सफीक ने कोई कड़ी मेहनत नहीं की है. सफीक का कहना है '8 साल पहले मैं सुबह अपने काम पर जा रहा था कि अचानक मेरे कानों में चिडिय़ा की आवाज पड़ी. मैं ने मस्ती के लिए उसे कापी करना चाहा. इस के बाद तो जो हुआ उस पर मैं खुद हैरान हो गया. मुझे लगा शायद मैं बीमार हो गया हूं.Ó वहां से काम पर जाने की बजाए सफीक वापस घर आ गया और घर पर सभी को उस ने चिडिय़ा की आवाज अपने मुंह से निकाल कर सुनाई. घर के सभी लोगों ने भी उस से यही सवाल पूछा 'तेरी तबियत तो ठीक है न?Ó सफीक को अंदाजा हो आया था कि उसकी जिंदगी अब नया मोडï लेने वाली है.
इस के बाद तो सफीक की जिंदगी ने मानों चिडिय़ा से पर उधार ले लिए हों... उस ने कई तरह की आवाजे निकालनी शुरु कर दी. एक छोटा सा रंगरेज जिला स्तर तक कार्यक्रम देने लगा. जहां जाता लोग उसे खासा पसंद करते, लेकिन उधार के परों पर ज्यादा लंबी उड़ान नहीं भरी जा सकती. जितने शो उस ने करे उन में सिर्फ 20 फीसदी का ही उसे पैसा मिला और जितना मिला उसे देखकर कोई भी कलाकार निराश होता. कुछ इसी तरह से अमीर लोगों ने सहायता के नाम पर उस का खूब लाभ उठाया. फिर भी सफीक अपने हुनर से कमाना चाहता था.
वह अपने हुनर के सहारे न्यूज टीवी तक तो जा पहुंचा, लेकिन आगे का रास्ता उसकी भूखी गरीबी खा गई. विदेशों में तो लोग अपने किसी हुनर पर मश्हूर हो जाते हैं. ऐसा नहीं है कि हमारे देश में हुनर की कद्र नहीं होती, होती है, लेकिन वह किसी पैसे वाले के पास हो तब. कोई गरीब अगर अपने हुनर के बल पर कमाना चाहे, तो उसे मिलते हैं धक्के और भूखा पेट. यह बात सफीक के जीवन से साबित होती है.
सफीक दिन में 200 रुपए कमाता है, जिन में से 100 रुपए वह काम पर और 100 रुपए घर पर देता है, जिन से 10 लोगों का पेट पाला जाता है. उस का सपना अमिताभ बच्चन से मिलने का नहीं है वह चाहता है कि उस के हुनर को देख कर खुद जानी लीवर उस से मिलने आएं.
सालों पहले ही पढ़ाई छोड़ चुका सफीक अपने हुनर की बदौलत बनारस का नाम आगे बढ़ाना चाहता है. इस के लिए वह बनारस सरकार तक से मदद की गुहार लगा चुका है, लेकिन सरकार की नींद बहुत गहरी है उस में तनिक भी बाधा न आई. सरकार की तरफ से उसे किसी तरह का कोई सहयोग नहीं मिला, तो सफीक ने अपने दम पर कोशिशें करनी शुरु कर दीं.
वह मुंबई पहुंच गया इस उम्मीद से कि वहां जरूर कोई उस के हुनर को पहचानेगा और वह अपने जीवन की सारी परेशानियों से नजात पा लेगा. सफीक का कहना है कि सभी को उस का काम पसंद आया, लेकिन किसी ने भी उसे काम करने का मौका नहीं दिया, क्योंकि उसे पास आर्टिस्ट कार्ड नहीं था, जिसे बनावाने में लगभग 10,000 रुपए का खर्च आता, जो कि सफीक के पास नहीं थे.
फिर भी सफीक मेहनत से नजर नहीं चुराता और वह लगातार कोशिशें कर रहा है. हाल में चुनाव के दौरान उसे लखनऊ में कुछ नया काम मिला है, जिस में वह नेताओं के लिए प्रदर्शन करेगा. अब सफीक को यह बात समझ आ गई है उसे अपने हुनर को सब के सामने लाने के लिए सरकार की आस छोड़ खुद ही प्रयास करने होंगे. सफीक को भी यह बात अच्छी तरह से समझ लेनी होगी कि उस का हुनर उधार के पैसे जैसा ही है, जिस से लाभ पाने के लिए उसे खासी मश्क्कत करनी होगी.
(यह लेख सरस सलील में छप चुका है, लेकिन काफी बातें जगह की कमी के कारण काट दी गई।)
सफीक 80-90 तरह की आवाजें अपने मुंह से निकाल सकता है. चाहे गाय, बकरी, मोर, घुंगरु, गाड़ी का हार्न, हैलिकोप्टर, रेल, आरकैस्ट्रा के ड्रम की आवाज हो या फिर सालों से बेकार पड़े किसी टेप की वह इतनी सफाई से सारी आवाजें निकालता है कि बस पूछिए मत. लेकिन इतने अच्छे हुनर के होते भी सफीक गरीबी में जी रहा है. बनारस का नाम ऊंचा करने की उस की इच्छा को सरकार ने अनसुना कर दिया है. वैसे भी भारत में कहां किसी गरीब को अपने हुनर के सहारे बढऩे का अधिकार है. गरीबों का बस एक ही काम है यहां, अपने दोनों हाथों के इस्तेमाल से दो जून की रोटी कमाना.
पिछले 8 सालों से सफीक रंगरेज अपने इस हुनर के बल पर लोगों को हंसाने के साथसाथ हैरान कर देता है. दातों तले उंगली ला देने वाले इस हुनर के लिए सफीक ने कोई कड़ी मेहनत नहीं की है. सफीक का कहना है '8 साल पहले मैं सुबह अपने काम पर जा रहा था कि अचानक मेरे कानों में चिडिय़ा की आवाज पड़ी. मैं ने मस्ती के लिए उसे कापी करना चाहा. इस के बाद तो जो हुआ उस पर मैं खुद हैरान हो गया. मुझे लगा शायद मैं बीमार हो गया हूं.Ó वहां से काम पर जाने की बजाए सफीक वापस घर आ गया और घर पर सभी को उस ने चिडिय़ा की आवाज अपने मुंह से निकाल कर सुनाई. घर के सभी लोगों ने भी उस से यही सवाल पूछा 'तेरी तबियत तो ठीक है न?Ó सफीक को अंदाजा हो आया था कि उसकी जिंदगी अब नया मोडï लेने वाली है.
इस के बाद तो सफीक की जिंदगी ने मानों चिडिय़ा से पर उधार ले लिए हों... उस ने कई तरह की आवाजे निकालनी शुरु कर दी. एक छोटा सा रंगरेज जिला स्तर तक कार्यक्रम देने लगा. जहां जाता लोग उसे खासा पसंद करते, लेकिन उधार के परों पर ज्यादा लंबी उड़ान नहीं भरी जा सकती. जितने शो उस ने करे उन में सिर्फ 20 फीसदी का ही उसे पैसा मिला और जितना मिला उसे देखकर कोई भी कलाकार निराश होता. कुछ इसी तरह से अमीर लोगों ने सहायता के नाम पर उस का खूब लाभ उठाया. फिर भी सफीक अपने हुनर से कमाना चाहता था.
वह अपने हुनर के सहारे न्यूज टीवी तक तो जा पहुंचा, लेकिन आगे का रास्ता उसकी भूखी गरीबी खा गई. विदेशों में तो लोग अपने किसी हुनर पर मश्हूर हो जाते हैं. ऐसा नहीं है कि हमारे देश में हुनर की कद्र नहीं होती, होती है, लेकिन वह किसी पैसे वाले के पास हो तब. कोई गरीब अगर अपने हुनर के बल पर कमाना चाहे, तो उसे मिलते हैं धक्के और भूखा पेट. यह बात सफीक के जीवन से साबित होती है.
सफीक दिन में 200 रुपए कमाता है, जिन में से 100 रुपए वह काम पर और 100 रुपए घर पर देता है, जिन से 10 लोगों का पेट पाला जाता है. उस का सपना अमिताभ बच्चन से मिलने का नहीं है वह चाहता है कि उस के हुनर को देख कर खुद जानी लीवर उस से मिलने आएं.
सालों पहले ही पढ़ाई छोड़ चुका सफीक अपने हुनर की बदौलत बनारस का नाम आगे बढ़ाना चाहता है. इस के लिए वह बनारस सरकार तक से मदद की गुहार लगा चुका है, लेकिन सरकार की नींद बहुत गहरी है उस में तनिक भी बाधा न आई. सरकार की तरफ से उसे किसी तरह का कोई सहयोग नहीं मिला, तो सफीक ने अपने दम पर कोशिशें करनी शुरु कर दीं.
वह मुंबई पहुंच गया इस उम्मीद से कि वहां जरूर कोई उस के हुनर को पहचानेगा और वह अपने जीवन की सारी परेशानियों से नजात पा लेगा. सफीक का कहना है कि सभी को उस का काम पसंद आया, लेकिन किसी ने भी उसे काम करने का मौका नहीं दिया, क्योंकि उसे पास आर्टिस्ट कार्ड नहीं था, जिसे बनावाने में लगभग 10,000 रुपए का खर्च आता, जो कि सफीक के पास नहीं थे.
फिर भी सफीक मेहनत से नजर नहीं चुराता और वह लगातार कोशिशें कर रहा है. हाल में चुनाव के दौरान उसे लखनऊ में कुछ नया काम मिला है, जिस में वह नेताओं के लिए प्रदर्शन करेगा. अब सफीक को यह बात समझ आ गई है उसे अपने हुनर को सब के सामने लाने के लिए सरकार की आस छोड़ खुद ही प्रयास करने होंगे. सफीक को भी यह बात अच्छी तरह से समझ लेनी होगी कि उस का हुनर उधार के पैसे जैसा ही है, जिस से लाभ पाने के लिए उसे खासी मश्क्कत करनी होगी.
(यह लेख सरस सलील में छप चुका है, लेकिन काफी बातें जगह की कमी के कारण काट दी गई।)
(अनिता शर्मा)
बहुत अच्छा व मर्मस्पर्शी लगा आपका यह लेख। सही कहा आपने इस देश में हुनरमंदों की कमी नहीं है, कमी है तो उन पहचान कर सही मुकाम देने की।
जवाब देंहटाएंइतना हुनर लेकर कम से कम भारत में कोई जन्म न ले तो अच्छा है .. भला यहां प्रतिभा को पहचान मिल सकती है क्या ?
जवाब देंहटाएंयही हाल है अपने यहाँ बेरसूकदार हुनरमंदो का.
जवाब देंहटाएंZee tv ke 'shabash india' mein inki cassette ya details bhejeeye.
जवाब देंहटाएंZee/star ka prasaran area sahara se kahin jyada hai.
बहुत अच्छा लिखा
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