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शुक्रवार, 24 अप्रैल 2009

बहकही न इहीं बहिनापूरी


हाय राम ये क्या हुआ! एक और बलात्कार। न जाने ये आदमी इतने भूखे क्युं होते जा रहे हैं कि अपनी औलाद तक को नहीं बक्षते। कई बार तो इनकी निक्कर से टपकती दर्जनों-लिटर लार को देखकर मैं भी घबरा जाती हूं कि कहीं मैं ही तो इनका अगला षिकार नहीं और मैं हूं भी तो एकदम दुबली पतली। एक बार हाथ पकडा और चल मेरे भाई, या अल्लाह ये मेरे मुह से कैसे निकला। ये लोग भाई कैसे हो सकते हैं ये तो कसाई होते हैं...

जो हर लडकी को बहन बनाकर उसकी इज्जत को इस कदर संभाल कर अपने पास रखतें हैं कि दूबारा वह खोने का डर ही न रहे और लडकी षांती से घूम सके. याद है मुझे ‘बिहारी’ का एक दोहा-
‘बहकही न इहीं बहिनापूरी...
...ज्यों चील घोंसला मांस’

मतलब इन लोगों के बहन बहन कहने पर मत जाना इनका बहन कहना उतना ही सुरक्षित है जितना कि चील के घोंसले में मांस होता है। आज अगर बिहारी जी यहां होते, तो मैं उनके चरणो में गिर जाती कि आप इतने विद्वान है, तो जरा हमें यह भी बता दीजिए कि इन बिना बडे दांतों वाले ड्रेकुलाओं को इतनी भीड में हम भला पहचाने तो कैसे ?

हर शाम एक डर के साथ आफिस से बाहर निकलकर बस में बैढ जाती हूं, पर एक डर न जाने क्युं बिन बुलाए पीछे पीछे आता रहता है। क्या करूं बेषर्म जो ठहरा, कितनी बार उसे धमकाया है कि मेरे पीछे न आए, पर वो कम्बख्त है कि उस पर जूं भी नहीं रेंगती।

खैर ये सोचकर सब्र कर लेती हूं कि डर तो मेरे साथ है अकेले होने से अच्छा किसी को साथ लेकर ही चलो। उस डर के पीछे सहमी सी जो औरत आपको आती नजर आ रही है न वो कोेई और नहीं मेरी अपनी लज्जा है पर क्या करूं इस कम्बख्त डर ने उसे पीछे छोड दिया। न जाने ये नंग्गे भूगे आदमी इस औरत का क्या करेंगे। वह रह भी तो पीछे जाती है न।

खैर मैं तो चलती जाती हूं चाहे किसी भले आदमी को भी गाली देनी पडे मैं राह में सब करती जाती हूं। और मेरी बेषर्म लज्जा मुंह लटकाए पीछे पीछे चुपचाप चलती रहती है वैसे भी उसे चुप रहने को ही कहा है मैनें उसी की वजह से इस डर ने मेरा पीछा करना जो षुरू कर दिया है अगर वो न होती तो मुझे किसी से डरने की क्या जरूरत पर वो है कि मेरे पीछे पडी रहती है कि मैं एक लडकी हूं इसलिए मेरे साथ उसका होना जरूरी है। कई बार सोचती हूं कि यह लज्जा अगर हम लडकियों कि जगह लडको का गहना होती तो षायद ये सारी नोबते आती ही नहीं और मुझ जैसे न जाने कितनी ही लडकियों को बेमन से अपने पीछे आते डर को सहना न पडता।

अनीता शर्मा
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