गुरुवार, 16 जुलाई 2009

शायद शीला दिल्ली को अपना नहीं मानती


सीधे शब्दों में एक छोटी सी बात रखना चाहूंगी। गर्मी लगातार बढ़ रही है, सूरज अपनी रोषनी से लोगों को जला रहा है, लगातार बिजली की कमी के चलते कटौती हो रही है, लेकिन देखने वाली बात यह है कि कितनी बिजली हम स्ट्रीट लाइट या रोड साइड एड पर खर्च कर देते हैं।

स्ट्रीट लाइट में तो फिर भी कम वाल्ट के बल्ब लगे होते हैं, लेकिन रोड के किनारों पर लगे विज्ञापनों या बस स्टेंड वगैरह पर लगे विज्ञापनों पर एक नहीं दो नहीं आप छः सात मरकरी लाइट को एक साथ देख सकते हैं.

तो कोई जाकर दिल्ली सरकार से पूछता क्यों नहीं कि यहां कि बिजली क्यांे नहीं काटी जाती। यहां पूरी रात लगातार लाइटें जलती रहती हैं यहां बिजली कटौती आखिर क्यों संभव नहीं है भई ?खैर सवाल जवाब से परे मैं शीलाजी के मष्तिष्क में बिजली कौंधवाना चाहती हूं. हमारी मुख्य मंत्री जी गर्मी में लोगांे को बिजली नहीं दे रही. करोडों पैसे यहां वहां बरबाद तो हो ही रहे हैं, फिर भी षीला सरकार कुछ पैसे खर्च करके बिजली बचाने के बारे में नहीं सोच रही.

पता नहीं क्यों वे रोड साइट विज्ञापनों, बस स्टेंड पर और स्ट्रीट लाइट के लिए सोलर ऊर्जा से क्यों कतरा रही हैं. वैसे तो खुद विज्ञापन दिलवाती हैं कि अपने घर में सोलर वाटर हिटर का इस्तेमाल करें और बिजली बचाएं साथ ही उस के प्लांटेषन पर खासी छूट और लोन तक दे रही हैं, लेकिन क्या उन की ये सारी बातें कोरी हिदायत भर हैं या फिर वे दिल्ली को अपना घर नहीं मानती.

अगर आप को इस के पीछे कोई ठोस वजह नजर आती है, तो कृप्या मुझे भी उस से अवगत कराएं

अनिता षर्मा

‘बित्ति बांधै डोरडी ठम्मा ठम, ठम्मा ठम‘



एक दौर हुआ करता था कि मां अपने बच्चों को घर में ठूंठती रह जाती थी, पर बच्चे चिलचिलाती धूप या कड़ाके की ठंड की परवाह किए बगैर यहां से वहां मारे मारे फिरते थे. वजह थी खेल.

बच्चे खेल खेल में एक गांव से दूसरे गांव तक पहुंच जाते या फिर सुबह से शाम होने तक एक ही गंेद से चिपके एक ही मैदान पर भागते रहते. उस दौर के किस्से अपनी मम्मी या पापा के मुंह से ही सुने हैं. उसी सुनहरे दौर का थोडा ही सही पर एक हिस्सा मेरे भाग्य में भी आया. चलो छुटते दौर की लंगोटी ही सही.

मुझे आज भी याद है नाना जी के गांव में भात्ता नाम का एक पागल हुआ करता था. हम बच्चों में सबसे बड़ा होने के चलते वह लम्बे समय तक हमारा मुखिया बना रहा. दो महीने की पूरी छूट्यिां वहां बिताने के चलते भात्ता से हमारा खासा लगाव था.

वह हर चैथे या पांचवे दिन हमें एक नया खेल सीखाता, लेकिन हां एक ऐसा खेल था, जो वह न जाने कब से भूला ही नहीं था. खेल का नाम था ‘बित्ति बांधै डोरडी‘ यह खेल भी उस ने खुद ही बनाया था. खेल में गांव के सभी हमउम्र बच्चे एक के पीछे एक खड़े होकर रेल के डब्बे बनते थे और इंजन का काम करता था खुद भात्ता.

बच्चों को उन की लंबाई के हिसाब से खड़ा किया जाता, जिस के चलते जो छोटे बच्चे जबरन खेल में घुसपैठ करते वे पीछे रह जाते. डब्बों के संयोजन के बाद षुरू होता था खेल.

भात्ता जोर से चीखता ‘बित्ति बांधै डोरडी‘ और हम सब पीछे पीछे बोलते ‘ठम्मा ठम, ठम्मा ठम‘ वेा यह बोलते ही भागना षुरू कर देता तो हम भी चाबी भरे रोबट से पीछे पीछे ठम्मा ठम, ठम्मा ठम कहते चल पड़ते. पूरे गांव का एक चक्कर, दो चक्कर, फिर तीन... और न जाने कितने ही चक्कर बच्चे लगा लेेते. जबरन घुसपैठ करने वाले जो छोटे बच्चे पीछे छूट जाते उन्हें आउट घोषित करते हुए घर जाने का आदेष दे दिया जाता, लेकिन जिद्दी बच्चे अगले चक्कर में फिर से घुसपैठ कर लेते.

सभी बच्चों में से अगर किसी के मुंह से गलती से भी गाली या कोई अपषब्द निकलता तो 2-3 दिन के लिए उसे भात्ता खेलों में षामिल नहीं करता था. दौड़ लगाने से लेकर कलाबाजी की कई तरह की प्रतियोगिताएं वह हमारे बीच करता ही रहता था.

भात्ता ही नही हम सब भी उस वक्त इस बात से दूर थे कि भात्ता अपने इस बेसिर पैर के खेल से हमारा षारीरिक विकास कर रहा था. इतना ही नहीं कई बार वह हमारे सामने कई अजीब से सवाल रख देता जिनके जवाब निकालने के लिए हम घंटों रेत पर उंगलियां घुमाते रहते थे, लेकिन जो जवाब उस से मिलता वह शायद ही कोई और दे पाता था.

लोग कहते थे कि भात्ता पागल है, लेकिन मेरी नजर में उस में दिमाग इफरात से था, जिस पर पागलपन का इफतरा लगा था. वरना नाना जी की हवेली की उस चोटी पर जिस पर बच्चों का जाना मना था, वह आसानी से न पहुंच पाता. वहां बंदरों के बीच षान से बैठकर वह हमारे लिए नए नए खेल कैसे बुन लेता था, मेरी समझ से यह आज भी परे है.

भात्ता के साथ मेरा कोई व्यक्तिगत जुडाव या संबंध नहीं था, लेकिन फिर भी न जाते क्यों मैं गांव जाते ही उसे ठूंठना शुरू कर देती. मेरी याद में उस से मेरे संवाद का कोई छुटपुट अंश भी होता, तो मैं उस पर पूरी कहानी लिख देती, लेकिन भात्ता की बातें सुनने के सिवाय मैंने शायद ही कभी उसे कुछ कहा हो.

पर मुझे भात्ता से स्नेह था. अगाध तो नहीं, पर स्नेह था जरूर. चाहे लेश मात्र ही हो... पर स्नेह की उपस्थिति जरूर थी. गांव से लोटने के पखवाड़े भरत बाद तक उस के साथ खेलने की ललक की भभक अकसर भीतर उठती थी. खैर, शहर की व्यस्त जीवनषैली में पहुंचते ही कब भात्ता गांव की सुनसान वनी में छिप जाता पता लगाना मुश्किल है.

जिंदगी के शायद 4-5 साल तक ही मैं उस का अनमोल सानिंध्य पा सकी। एक बार गांव जाने पर पता लगा कि वह किसी रात ट्रक के पीछे लटक कर जाने कहां चला गया. भात्ता पागलपन के इफतरे के साथ जाने कहां चला गया. आज जब घर पर बचपन की बात चली तो बचपन की यादों की हवेली से उस ने मुझे पुकार ही लिया. वह जोर जोर से कह रहा था ‘बित्ति बांधै डोरडी‘ और अनायास ही मेरे मुंह से निकल पड़ा ‘ठम्मा ठम, ठम्मा ठम‘

मैंने मम्मी से पूछा ‘‘ बित्ति बांधै डोरडी का मतलब क्या होता है.‘‘ उन की आंखों में एक अजीब सी चमक आ गई. उन्होंने मुस्कराते हुए कहां ‘‘भात्ता ?‘‘ उन के सवाल पर मैंने हां में सर हिला दिया.
‘‘ इस का कोई मतलब नहीं होता, वो पागल था. भला पागलों की बातों का भी कभी कोई मतलब होता है.‘‘ और वह उठकर चली गई.

लेकिन मैं जानती हूं इस बात का जरूर कोई अर्थ है। कोई गहरा अर्थ, जो ेषायद हम समझदारों के शब्दार्थ से परे है. शायद आप मुझे भी पागल समझे जो एक पागल की बातों में अर्थ को खोज रही है, पर इस पागलपन भरे अपनेपन की ही आज हम सब को जरूरत है. क्योंकि आज के इस दौर में जब अच्छे दिखने वाले लोग हमें दगा दे जाते हैं, तब उस समय का वह भोला भात्ता आज भी मेरे स्नेह से लबालब है, भले ही मुझ से दूर क्यों न हो।
बचपन का एक साथी जिसे लोग पागल कहते थे, यकायक यादों की अंधेरी कोठरी में टिमटिमाने लगा. मैं उस के विषय में कुछ ज्यादा तो नहीं जानती, लेकिन अपनी श्रृद्धा सुमन उस की यादों के पायदान पर अर्पित कर रही हूं. नहीं जानती कि वो इस वक्त कहां है, पर चाहती हूं कि जहां रहे खुष रहे...

अनीता शर्मा

बुधवार, 15 जुलाई 2009

एक पत्रकार की कहानी

हाल ही में हमारे एक और पत्रकार भाई की संदिग्ध हालातों में हत्या की खबर मिली. इन दिनों इस तरह की हत्याओं के मामले कुछ ज्यादा ही सामने आ रहे हैं. शायद इसी के चलते हमारे बास ने हमें हाल ही में एक दमदार स्टोरी करने से मना कर दिया. हमारी तैयारी पूरी थी कुछ लोगों की पोल खोलने की, लेकिन जैसे ही बास ने मना किया हमारे थोथे मीडिया जगत की ही पोल खुल गई कि खुद को निडर और कलम का सच्चा सिपाही कहने वाले हमारे मीडिया सैनिक कितने डरपोक हैं. पर जनाब हम नहीं हैं डरपोक. हम तो अपनी स्टोरी को कर के ही मानेगें.
पर कैसे? पैसे वैसे तो हैं नहीं और बास ने स्टोरी के लिए मना कर दिया तो अब कन्वेंस भी नहीं मिलेगा. छोड़ो भी यार अब कुछ तो तहलका मचाना ही चाहिए न. जब स्टोरी कवर कर लेंगें और वह हिट हो जाएगी, तो बास खुश होकर कंवेंस भी दिला ही देंगे. अब तो हम बास को बिना बताए स्टोरी करने की पूरी फिराक बना चुके हैं.
एक बार यह स्टोरी हो गई, तो मीडिया जगत में अनिता शर्मा का नाम चमक जाएगा. और अगर जान जाती है, तो जाए... साला जी कर भी कौन से झंड़े गाड़ देंगे हम. कम से कम मर कर कुछ दिन टीवी पर तो चिपके रहेंगे.... वैसे भी इस मनहूस इलैक्ट्रानिक मीडिया वालों को जाने हमारी सूरत से क्या परहेज है... कितना ही अच्छा लिख लो हमें स्क्रीन पर नहीं दिखाते. जनाब कहते हैँ कि हमारी आवाज पैनी है वीओ अच्छा नहीं जाएगा, स्क्रीन पर चेहरे के दाग दिख रहे हैं, चेहरे पर एक्प्रेशन नहीं हैं वगैरह वगैरह बहाने बना कर हमे उस स्क्रीन नामक सोने की चिड़ी से दूर ही बनाए रखते हैं.
अब आए दिन हमारे पत्रकार मित्रों की हत्या की खबरें आती रहती हैं. और जो स्टोरी हम करने जा रहे हैं उस में भी मौत का कोई कम डर तो नहीं. इसलिए ही हम स्टोरी करने से पहले ही एक सुंदर सी फोटो खिचवाएंगें और उसे हर मीडिया हाउस में भेजेंगें, ब्लाग पर लगाएंगे, फेसबुक, आरकुट हर सोशल नेटवर्क साइट पर उसे चिपकाएंगे. अरे भई अगर मर गए, तो मीडिया वाले हमारे दोस्तों को फोटो ठूंठने में मशक्कत नहीं करनी पड़ेगी न और कम मशक्कत वाली स्टोरी को करना हमारे भाई लोगों को ज्यादा ही पसंद है. और कहीं किसी ने हमारी कोई गंदी सी फोटो दिखा दी तो, नहीं नहीं... हम अपनी सुंदर से फोटो की सरल उपलब्धता का पूरा जुगाड़ कर के ही स्टोरी कवर करने जाएंगे. भई जिंदा रहे तो हीरो मर गए तो हीरो. यानी चट भी मेरी पट भी मेरी वो भी झटपट.
जब हमने मीडिया के पाठ्यक्रम में दाखिला लिया था, तो क्या जानते थे कि यहां इतनी भुखमरी है. हमें तो टीवी दिख रहा था और दिख रही थी उस पर हमारी सुंदर सी सूरत. पर जनाब ग्लैमर के चक्कर में मारे गए हम. वरना यहां पाठ्यक्रम खत्म होने के एक साल बाद भी महज 10 हजार ही कमा रहे हैं कहीं और होते, तो 40-30 पर हाथ पसारे ठाठ से रहते. लेकिन क्या करें मति जो मारी गई थी हमारी, जो डेढ़ लाख का कोर्स किया महज 10 हजार की नौकरी के लिए. हाय रे टीवी पर भी नहीं दिखे.
खैर, अब और नहीं. यह स्टोरी हो गई, तो तनख्वाह और रुतबा दोनों ही बढ़ेंगे. मर गए तो भी मीडिया के इतिहास में अमर हो जाएंगे. हम साबित कर देंगे कि हम डरपोक पत्रकार नहीं. हर समाचार पत्र, चैनल और रेडिया स्टेशन पर हम ही छाए होंगे. हमारी मिसाल दी जाएगी. मीडिया पर लिखी जाने वाली हर किताब में हमारा जिक्र होगा और हमें महान और निडऱ पत्रकारों की लिस्ट में शामिल किया जाएगा.
पर डर है, कहीं हमारी मौत को कवरेज ही न मिली तो? या हमारी स्टोरी को सराहा न गया तो? अरे धुत्त मिलेगी कैसे नहीं, हमारी स्टोरी धांसू जो ठहरी. आखिर काल गल्र्स के धंधे पर है, सैक्स से जुड़ी है, हिट तो होगी ही. पर आए दिन ऐसी खबरे छपती रहती हैं, हमारे पास भला क्या नया होगा?
अरे यार नया नहीं है तो न सही. हम खुद ही कुछ ऐसा जोड़ देगें जो स्टोरी को दमदार बना दे. हमारी बात पर सब यकीन करेंगें, आखिर हम पत्रकार जो ठहरे. अब सच्चे हों या झूठे पत्रकार तो पत्रकार होता है. हम ही क्या हमारे दोस्त भी ऐसे ही करते हैं.
हम खयालों में ही डूबे थे कि यकायक फोन बज उठा. अरे हमारे बास का फोन था. हमने फोन उठाया तो दूसरी तरफ से सरपट सी आवाज कोनों में घुस गई ''कहां हो तुम? तुम ने जो स्टोरी परसों फाइल की थी उस पर केस हो गया है. भावे जी का कहना है कि तुमने उन से बात किए बिना ही उन्हें कोट किया है. आफिस पहुंचों एडिटर जी गुस्से में हैं और तुम से मिलना चाहते हैंÓÓ
हमें लगा कि हमारी स्टोरी कवर करने से पहले ही किसी ने कह दिया हो 'पैक अपÓ। हम मुंह लटका कर स्टोरी भूल भाल कर खुद को बचाने के उपाय ठूंठने की जुगत में लग गए.

( अनीता शर्मा )

शनिवार, 25 अप्रैल 2009

त्रासदी भरी एक रात...


ट्रुं-ट्रुं-ट्रुं-ट्रुं-ट्रुं-ट्रुं-ट्रुं-ट्रुं-ट्रुं-ट्रुं-ट्रुं-ट्रुं-ट्रुं- ओह ! मैने फिर से सिर पकड़ लिया और बड़े बेमन से फोन उठाया। ''क्‍या है'' ? सामने से किसी एक चाहने वाले के वही चिंता भरे शब्‍द जो पिछले आधे घंटे से सुन रही थी, ''कहां पहुंची, दिल्‍ली में तो नहीं है अगर नोएडा है, तो वहीं रूक मैं लेने आता हूं, या ऐसा कर मेरे घर चली जा' मैने इस बार कोई जवाब नहीं दिया, बस चुप, निरुत्‍तर एक अजीब सी हंसी के साथ फोन रख दिया। हंसी शायद कुछ ज्‍यादा ही अजीब थी इसलिए बस में खड़े सभी लोग मुझे अजीब नजर से देखने लगे। अब ये ना पूछिएगा कि वो अजीब नजर कैसी थी, क्‍योंकि जनाब जवाब में मैं फिर वही अजीब हंसी बिखेर दूंगी। इस अजीब- अजीब को समझने के चक्‍कर में आप भी अजीब चक्‍कर में फंस जाएंगे। 13 सितंबर 2008 को ऑफिस से फोन आने का जो सिलसिला शुरु हुआ वो दो दिन बाद तक उसी तरह चलता रहा। खैर, मैं उस रात मैं 8.40 पर जा पहुंची बाराखम्‍बा, ठीक वहीं जहां ब्‍लास्‍ट हुआ था। पहुंचने से पहले मन में एक टीस थी जो निरंतर रुआंसी को उत्‍पन्‍न कर देती और मैं टपकने से पहले ही खारे आसुंओं का घूंट भर लेती। जब बस से उतरी तो चारों ओर वही 'अजीब' सी चहल पहल। लड़के-लड़की का एक जोड़ा उस भीड से निकलकर आ रहा था, जिनहें देखकर ऐसा लगा मानों सिनेमाघर में कोई शो अभी खत्‍म ही हुआ हो.... यह भी कुछ अजीब ही लगा। मन में उठ रहे कई सवालों के साथ मेरा एक-एक कदम दस-दस मन का हो चला था, हाथ न जाने क्‍यों बार-बार बालों में जा रहे थे और होंठ दांत के नीचे। 30-40 कदमों की यह दूरी आखिरकार खत्‍म हो ही गई और मैनें खुद को पाया संवेदनाओं के एक अथाह समुंद्र के सम्‍मुख जिसे बिना किसी नाव और पाथेह के मुझे पार उतरना था।
ठीक सुलभ शौचालय के सामने बीच में कुछ जगह खाली छोड़ चारों ओर इंसानों की झड़ी सी लगी थी, कुछ नौटंकी करने वाले अपने कैमरों के साथ शौचालय के छतनुमा मंच पर जा विराजमान थे और निरंतर अपनी अभिनय कला को उभारने में लगे थे। मैं उनके अभिनय के गुर सीख रही थी कि सहसा कानों में किसी की गर्म शीशे सी आवाज ने दस्‍तक दी 'यह त्रासदी...' किसी संवाददाता की आवाज थी शायद। आगे उस आवाज ने क्‍या कहा मैने नहीं सुना.... मेरे कानों ने जो शब्‍द देखा वो था 'त्रासदी' फिर क्‍या था कानो देखा सच कहां होता है ? सो आंखों ने भी उसे तलाशना शुरु कर दिया। मैने देखा वहां एक नहीं कई त्रासदियां पसरी पड़ी थी, गहरी नींद में... जिनकी किसी को भनक भी न थी।
कोई हाई-फाई से दिखने वाले फोटोग्राफर साहब आकर कहते हैं ' साले... छोटे छोटे पटाखे छोड़कर हमें परेशान करते हैं... करना ही है तो कुछ बडा करो'। और इसी के साथ मेरी नजर आकर टिक गई इस नई त्रासदी पर। जाहिर है उन जनाब को वहां खून से लथपथ लाशें और रोत बिलखते गरीब चेहरे नहीं मिले, जिनकी तस्‍वीर उतारकर वे पैसे बना पाते। जरा मुंह घुमाया नहीं कि एक और त्रासदी मेरा रास्‍ता रोके खड़ी थी। तीन पुलिस वाले सबके नाम बताना कुछ सही नहीं लगता पर हां एक जनाब जो बहुत ज्‍यादा बोल रहे थे उनकी राशी से वे सिंह थे और बातों न जाने क्‍या थे। तीखी और ऊंची आवाज में उसने कहा 'बहन चो...कहते हैं एक घंटा लेट है पुलिस अब पुलिस क्‍या करे जब पता चला तो चले आए...। इतने पैसे नहीं देते जितने सवाल पूछते हैं, जिसे देखो हमारी ही कॉलर के ऊपर लपकता है'। फिर पता नहीं कितनी बार उसने मीडिया वालों की मां-बहन एक कर दी।
मन खट्टा हो गया, मानों इमली खा ली हो... नहीं, नहीं मानो खाने के बाद मिर्च वाली खट्टी डकार, ओह ! सोचा अब तो मैट्रो से घर की राह ली जाए, पर क्‍या जनाती थी कि आगे एक और त्रासदी टकटकी लगाए मेरी राह देख रही है। जनाब किसी बड़े अखबार के पत्रकारों का गुट खड़ा था नाम नहीं जानती कि कौन कौन थे, पर हां, वो जरूर सुना जो वे बतिया रहे थे 'जरा सोचो... क्‍या होगा हमारे देश का जहां पुलिस के पास निशान लगाने के लिए चॉक न हो, फुटपाथ के पत्‍थरों से जो बाउंड्री लाइन बनाए वहां आतंक से कैसे रुक सकता है।' उनकी बातों में कोई मजेदार त्रासदी नहीं दिखी तो सोचा पैदल पैदल ही निकला जाए.... कि अचानक मैं एक बच्‍चे से टकरा गई, बड़ी फैली आंखें डबडबाई सी, पतले और सिकुडे होंठ... मुस्‍कुरा रहे थे। उसने हाथों में गुब्‍बारे पकड़ रखे थे। अरे, ये तो एक और त्रासदी आ चिपकी मुझसे...। मैने उसे हटाना चाहा पर वो बच्‍चा आज अचानक ही लाइम लाइट मे आ गया – क्‍यों ? अरे भाई त्रासदी की वजह से। छोटी सी उम्र में गुब्‍बारे बेचता है, न जाने क्‍या कारण रहा होगा इसका ? पर इस बारे में सोचने का वक्‍त किसके पास है। यहां तो सभी ' सबसे आगे, सबसे तेज' और 'खबर हर कीमत पर' जुटाने में लगे हैं। सो, कई काले मुंह वाले डिब्‍बों को उस नन्‍हीं सी त्रासदी पर फोकस कर दिया गया, और कान मरोड़े चमगादड़ उसके मुंह के आगे अड़ा दिया, बेचारा बोलता रहा। करता भी क्‍या, आज तो दिन ही त्रासदी का था। मैं कुछ ज्‍यादा ही संवेदनशील हूं, मन भर आया तो वहां से पैर पटककर चल दी।
अब मुझे कानों से देखे शब्‍द 'त्रासदी' पर विश्वास हो आया था, पर यह त्रासदी तो भयानक भूत सी हर जगह मेरे सामने आकर खड़ी होती। जब मीडिया के चीचड़ उस नन्‍हे बच्‍चे से बातों में चिपक रहे थे तभी पुलिस के कोई बड़े अधिकारी वहां आ गए और छिपकर पीछे जा खड़े हुए। थोड़ी देर में जनाब चलते बने। हो गया उनका निरीक्षण पूरा। उम्‍ह...
मैने फिर पैर पटके और वापस चली ही थी कि दो ट्रैफिक पुलिस रॉंग साइड बिना हैलमैट चले आ रहे थे और जहां मुड़ना मना था वे शहंशाह उसी राह से चल दिए। एक ही घंटे में अचानक से इतनी सारी त्रासदियों का सामना करने के लिए मैं तैयार न थी। सो सिर गढाकर वहीं फुटपाथ पर बैठ गई, कि अचानक से एक अजनबी त्रासदी ने दस्‍तक दी। कंधे पर हाथ रखा और कहा... 'ग्राहक नहीं मिला क्‍या? कोई बात नहीं, बता कितने लेगी...? मैने सिर उठाकर देखा तो एक सभ्‍य से पुरुश मेरी ओर लार भरी निगाह के साथ लपलपा रहे थे। कोई उत्‍तर ना पाकर उन्‍होने कहा, 500 रूपए ले लेना, पर सुन जरा जल्‍दी चल ना...। मेरे मन में एक तेज घृणा उत्‍पन्‍न हो आई उस सभ्‍य पुरुश के लिए, उसकी अतृप्‍त भूख के लिए, उसके लार टपकाते अंगों के लिए जो बिना वक्‍त जाने कहीं भी उत्‍सुक हो उठते हैं।
मैं उठी तो, यह त्रासदी कुछ देर तक पीछे आती रही। अब मेरे लिए इतने बोझ के साथ चलना मु‍‍श्किल हो रहा था, कि अचानक बस आई और मैं उसमें जा बैठी। बस में भी कई त्रा‍सदियां डंडे पकड़े खड़ी थी, सभी की निगाहें देर रात अकेली लड़की पर थी, मुझे लगा समाचारों में जिस दिल्‍ली के दुखी होने की बात की जा रही है वह दिल्‍ली तो कहीं और है यह तो नहीं हो सकती। बस में तेजी से गाने की ध्‍वनि रह रह कर छू जाती... 'दुनिया गई तेल लेने...' मैनें आंखें बंद कर ली।
दरअसल, सच तो यह था कि किसी को इन धमाकों से कोई सरोकार न था, सभी अपनी अपनी त्रासदियों को लेकर आगे बढ़ रहे हैं। लगता है कि इस शहर में आदमी तो है ही नहीं, जीवन, भावनाएं, संवेदनाएं सभी बाजारों के बड़े शो-रूमों के शोकेसों में बंद हैं, जिन्‍हें गाहे-बगाहे नुमाइश के लिए खोल दिया जाता है। असल में तो यहां रहने वाला हर शरीर एक त्रासदी की सांस भरता है। जो अक्‍सर छूट कर अखबारों की सुर्खियों में परस जाती हैं...

अनीता शर्मा

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2009

बहकही न इहीं बहिनापूरी


हाय राम ये क्या हुआ! एक और बलात्कार। न जाने ये आदमी इतने भूखे क्युं होते जा रहे हैं कि अपनी औलाद तक को नहीं बक्षते। कई बार तो इनकी निक्कर से टपकती दर्जनों-लिटर लार को देखकर मैं भी घबरा जाती हूं कि कहीं मैं ही तो इनका अगला षिकार नहीं और मैं हूं भी तो एकदम दुबली पतली। एक बार हाथ पकडा और चल मेरे भाई, या अल्लाह ये मेरे मुह से कैसे निकला। ये लोग भाई कैसे हो सकते हैं ये तो कसाई होते हैं...

जो हर लडकी को बहन बनाकर उसकी इज्जत को इस कदर संभाल कर अपने पास रखतें हैं कि दूबारा वह खोने का डर ही न रहे और लडकी षांती से घूम सके. याद है मुझे ‘बिहारी’ का एक दोहा-
‘बहकही न इहीं बहिनापूरी...
...ज्यों चील घोंसला मांस’

मतलब इन लोगों के बहन बहन कहने पर मत जाना इनका बहन कहना उतना ही सुरक्षित है जितना कि चील के घोंसले में मांस होता है। आज अगर बिहारी जी यहां होते, तो मैं उनके चरणो में गिर जाती कि आप इतने विद्वान है, तो जरा हमें यह भी बता दीजिए कि इन बिना बडे दांतों वाले ड्रेकुलाओं को इतनी भीड में हम भला पहचाने तो कैसे ?

हर शाम एक डर के साथ आफिस से बाहर निकलकर बस में बैढ जाती हूं, पर एक डर न जाने क्युं बिन बुलाए पीछे पीछे आता रहता है। क्या करूं बेषर्म जो ठहरा, कितनी बार उसे धमकाया है कि मेरे पीछे न आए, पर वो कम्बख्त है कि उस पर जूं भी नहीं रेंगती।

खैर ये सोचकर सब्र कर लेती हूं कि डर तो मेरे साथ है अकेले होने से अच्छा किसी को साथ लेकर ही चलो। उस डर के पीछे सहमी सी जो औरत आपको आती नजर आ रही है न वो कोेई और नहीं मेरी अपनी लज्जा है पर क्या करूं इस कम्बख्त डर ने उसे पीछे छोड दिया। न जाने ये नंग्गे भूगे आदमी इस औरत का क्या करेंगे। वह रह भी तो पीछे जाती है न।

खैर मैं तो चलती जाती हूं चाहे किसी भले आदमी को भी गाली देनी पडे मैं राह में सब करती जाती हूं। और मेरी बेषर्म लज्जा मुंह लटकाए पीछे पीछे चुपचाप चलती रहती है वैसे भी उसे चुप रहने को ही कहा है मैनें उसी की वजह से इस डर ने मेरा पीछा करना जो षुरू कर दिया है अगर वो न होती तो मुझे किसी से डरने की क्या जरूरत पर वो है कि मेरे पीछे पडी रहती है कि मैं एक लडकी हूं इसलिए मेरे साथ उसका होना जरूरी है। कई बार सोचती हूं कि यह लज्जा अगर हम लडकियों कि जगह लडको का गहना होती तो षायद ये सारी नोबते आती ही नहीं और मुझ जैसे न जाने कितनी ही लडकियों को बेमन से अपने पीछे आते डर को सहना न पडता।

अनीता शर्मा

बुधवार, 22 अप्रैल 2009

सफीक का हुनर मानों उधार का पैसा


क्या आप ने कभी दीवार से हार्न बजाने की आवाज सुनी है या फिर कभी आप के कांवकांव करने पर आसमान में कौवे इकट्ठे हुए हैं. आप सोच रहे होंगे कि यह सिर्फ फिल्मों में होता है, पर यकीन मानिए एक ऐसा शख्स है, जो यह सब कर सकता है. पर किसी हिन्दी फिल्म का हीरो नहीं है, वह है बनारस के दूल्हेपुर गांव में दुपट्टे रंगने वाला सफीक रंगरेज.
सफीक 80-90 तरह की आवाजें अपने मुंह से निकाल सकता है. चाहे गाय, बकरी, मोर, घुंगरु, गाड़ी का हार्न, हैलिकोप्टर, रेल, आरकैस्ट्रा के ड्रम की आवाज हो या फिर सालों से बेकार पड़े किसी टेप की वह इतनी सफाई से सारी आवाजें निकालता है कि बस पूछिए मत. लेकिन इतने अच्छे हुनर के होते भी सफीक गरीबी में जी रहा है. बनारस का नाम ऊंचा करने की उस की इच्छा को सरकार ने अनसुना कर दिया है. वैसे भी भारत में कहां किसी गरीब को अपने हुनर के सहारे बढऩे का अधिकार है. गरीबों का बस एक ही काम है यहां, अपने दोनों हाथों के इस्तेमाल से दो जून की रोटी कमाना.
पिछले 8 सालों से सफीक रंगरेज अपने इस हुनर के बल पर लोगों को हंसाने के साथसाथ हैरान कर देता है. दातों तले उंगली ला देने वाले इस हुनर के लिए सफीक ने कोई कड़ी मेहनत नहीं की है. सफीक का कहना है '8 साल पहले मैं सुबह अपने काम पर जा रहा था कि अचानक मेरे कानों में चिडिय़ा की आवाज पड़ी. मैं ने मस्ती के लिए उसे कापी करना चाहा. इस के बाद तो जो हुआ उस पर मैं खुद हैरान हो गया. मुझे लगा शायद मैं बीमार हो गया हूं.Ó वहां से काम पर जाने की बजाए सफीक वापस घर आ गया और घर पर सभी को उस ने चिडिय़ा की आवाज अपने मुंह से निकाल कर सुनाई. घर के सभी लोगों ने भी उस से यही सवाल पूछा 'तेरी तबियत तो ठीक है न?Ó सफीक को अंदाजा हो आया था कि उसकी जिंदगी अब नया मोडï लेने वाली है.
इस के बाद तो सफीक की जिंदगी ने मानों चिडिय़ा से पर उधार ले लिए हों... उस ने कई तरह की आवाजे निकालनी शुरु कर दी. एक छोटा सा रंगरेज जिला स्तर तक कार्यक्रम देने लगा. जहां जाता लोग उसे खासा पसंद करते, लेकिन उधार के परों पर ज्यादा लंबी उड़ान नहीं भरी जा सकती. जितने शो उस ने करे उन में सिर्फ 20 फीसदी का ही उसे पैसा मिला और जितना मिला उसे देखकर कोई भी कलाकार निराश होता. कुछ इसी तरह से अमीर लोगों ने सहायता के नाम पर उस का खूब लाभ उठाया. फिर भी सफीक अपने हुनर से कमाना चाहता था.
वह अपने हुनर के सहारे न्यूज टीवी तक तो जा पहुंचा, लेकिन आगे का रास्ता उसकी भूखी गरीबी खा गई. विदेशों में तो लोग अपने किसी हुनर पर मश्हूर हो जाते हैं. ऐसा नहीं है कि हमारे देश में हुनर की कद्र नहीं होती, होती है, लेकिन वह किसी पैसे वाले के पास हो तब. कोई गरीब अगर अपने हुनर के बल पर कमाना चाहे, तो उसे मिलते हैं धक्के और भूखा पेट. यह बात सफीक के जीवन से साबित होती है.
सफीक दिन में 200 रुपए कमाता है, जिन में से 100 रुपए वह काम पर और 100 रुपए घर पर देता है, जिन से 10 लोगों का पेट पाला जाता है. उस का सपना अमिताभ बच्चन से मिलने का नहीं है वह चाहता है कि उस के हुनर को देख कर खुद जानी लीवर उस से मिलने आएं.
सालों पहले ही पढ़ाई छोड़ चुका सफीक अपने हुनर की बदौलत बनारस का नाम आगे बढ़ाना चाहता है. इस के लिए वह बनारस सरकार तक से मदद की गुहार लगा चुका है, लेकिन सरकार की नींद बहुत गहरी है उस में तनिक भी बाधा न आई. सरकार की तरफ से उसे किसी तरह का कोई सहयोग नहीं मिला, तो सफीक ने अपने दम पर कोशिशें करनी शुरु कर दीं.
वह मुंबई पहुंच गया इस उम्मीद से कि वहां जरूर कोई उस के हुनर को पहचानेगा और वह अपने जीवन की सारी परेशानियों से नजात पा लेगा. सफीक का कहना है कि सभी को उस का काम पसंद आया, लेकिन किसी ने भी उसे काम करने का मौका नहीं दिया, क्योंकि उसे पास आर्टिस्ट कार्ड नहीं था, जिसे बनावाने में लगभग 10,000 रुपए का खर्च आता, जो कि सफीक के पास नहीं थे.
फिर भी सफीक मेहनत से नजर नहीं चुराता और वह लगातार कोशिशें कर रहा है. हाल में चुनाव के दौरान उसे लखनऊ में कुछ नया काम मिला है, जिस में वह नेताओं के लिए प्रदर्शन करेगा. अब सफीक को यह बात समझ आ गई है उसे अपने हुनर को सब के सामने लाने के लिए सरकार की आस छोड़ खुद ही प्रयास करने होंगे. सफीक को भी यह बात अच्छी तरह से समझ लेनी होगी कि उस का हुनर उधार के पैसे जैसा ही है, जिस से लाभ पाने के लिए उसे खासी मश्क्कत करनी होगी.
(यह लेख सरस सलील में छप चुका है, लेकिन काफी बातें जगह की कमी के कारण काट दी गई।)

(अनिता शर्मा)

शनिवार, 11 अप्रैल 2009

मेरे गुन-ओगुन गिनों न गोपीनाथ

बस के बारे में मै तो बस इतना ही कहता हूं
किजे चित सोई रहे निज पतितन के साथ मेरे गुनओगुन गिनों न गोपीनाथ
(ब्लू-घोस्ट) मै तो नित यही प्राथना करता हुं किः-
हे! संहारक मेरी रक्षा करना। बचपन से हमें पढाया और समझाया गया कि जीवन का स्वामी उपरवाला है और आज मुझे इस बात का सही मतलब समझ में आया है, आखिर जो गाड़ी आपके उपर से निकलेगी वही तो प्राणो की स्वामिनी होगी। तो हुई ना जान उपरवाले (ब्लूलाइन बस के ड्राइवर) के हाथ में, और साथ ही साथ पैरों में भी कि अगर सही वक्त पर ये ब्रेक नहीं दबाएंगे तो मेरे प्राण पखेरू इस तरह उडेंगें के जैसे उन्हें मेंरा शरीर रूपी पिंजरें में से किसी के पसीने वाले जूतो सी बू आ रही हो और वह खुलें भी पहली बार हो।
कहीं ब्रेक की जगह पर एक्सीलेटर दब गया तो मेरे प्राण उडेगें नहीं बल्कि उनके टायर रूपी कडों में एक और नग की तरह जड जाएंगें। मैं जब भी घर से निकलता हूं तो मेरी यही प्रार्थना होती है कि ऐ परमात्मा इन तेज दौडती इश्वरीयषक्ति वाली वाले ‘‘ मौत के फरिश्तों’’ की एक दूसरे को अधिक से अधिक खून पीने के लिए उत्साहित करती पी-पी की तेज आवाज में अगर मेेरी ये दबी सी आवाज़ सुन पा रहे हो तो मेरा सामना किसी ब्लूलाइन बस से मत करवाना हे! दीनानाथ मेरे मन में भूल से भी कभी किसी ब्लू लाइन बस को ओवरटेक करने का आत्मघाती विचार ना आए और अगर कहीं मै गलती से उन्हें ओवरटेक कर भी जाउ तो तुम उनके दिमाग को ठंडा ही रखना, उनके दिल में प्रतिशोध की भावना का बीज पनपने ना देना, उनके मन का ऐसा विचार मेरे लिए जानलेवा साबित हो सकता है। इस कलयुग मे यह बस के ड्राइवर संसार को सच्चाई का आभास दिलाते रहते है कि भगवान और मौत को कभी नहीं भूलना चाहिए।
पानी मे रहकर मगरमच्छ से बैर अच्छा नहीं, मुझे अभी जीना है। इसलिए सड़क पर चलते हुए मै इनकी इस धमकी को कभी न भूलुगां ‘‘करपा उचित दूरी बनाए रखें’’अन्यथा हमें दोष न दें। वैसे भी इन्होने यह घोषणा कर रखी है कि ‘‘या तो यूं ही चालेगी’’। देख लो भाईजान अगर जान प्यारी है तो इनकी बात मान लों नहीं तो भुल जाओ के जान नाम की भी कोई चिडीया होती भी है। अगर हालात ऐसे ही रहे तो दिल्ली की सड़कों पर होर्डिंग टंगे नजर आएंगे ‘प्लीज कीप अवे फ्रोम ब्लूलाइन बसेज़, एंड सेव योर लाइफ’। ये सोचता हूं कि अगर अरस्तु आज जिंदा होते तो ‘राज्य एक आवश्यक बुराई है ’ वाली अपनी बात को ‘ दिल्ली वालों की मजबूरी है, अभी ब्लूलाइन ज़रूरी है।’ कर लेते शायद आज के संदर्भ में ज्यादा सटीक होती।
भारत मल्होत्रा का यह लेख उन्होंने करीब महीनो पहले लिखा था, किसी अखबार में तो नहीं छप पाया, लेकिन प्रांसगिक आज भी उतना ही है जितना तब था . भारत वर्तमान में क्रिकखबर डाट काम www.crickhabar.com से जुड़े हैं, आप अगर उनसे संपर्क करना चाहें तो उनकी इमेल आईडी है- bharatmalhotra83/gmail.कॉम इसके अलावा उनका ब्लाग भी है जहां आप उनकी अन्य रचनायें kucchbaten।blogspot.com bharatmalhotra-bhanu.blogspot. कॉम देख सकते हैं।
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