गुरुवार, 16 जुलाई 2009

‘बित्ति बांधै डोरडी ठम्मा ठम, ठम्मा ठम‘



एक दौर हुआ करता था कि मां अपने बच्चों को घर में ठूंठती रह जाती थी, पर बच्चे चिलचिलाती धूप या कड़ाके की ठंड की परवाह किए बगैर यहां से वहां मारे मारे फिरते थे. वजह थी खेल.

बच्चे खेल खेल में एक गांव से दूसरे गांव तक पहुंच जाते या फिर सुबह से शाम होने तक एक ही गंेद से चिपके एक ही मैदान पर भागते रहते. उस दौर के किस्से अपनी मम्मी या पापा के मुंह से ही सुने हैं. उसी सुनहरे दौर का थोडा ही सही पर एक हिस्सा मेरे भाग्य में भी आया. चलो छुटते दौर की लंगोटी ही सही.

मुझे आज भी याद है नाना जी के गांव में भात्ता नाम का एक पागल हुआ करता था. हम बच्चों में सबसे बड़ा होने के चलते वह लम्बे समय तक हमारा मुखिया बना रहा. दो महीने की पूरी छूट्यिां वहां बिताने के चलते भात्ता से हमारा खासा लगाव था.

वह हर चैथे या पांचवे दिन हमें एक नया खेल सीखाता, लेकिन हां एक ऐसा खेल था, जो वह न जाने कब से भूला ही नहीं था. खेल का नाम था ‘बित्ति बांधै डोरडी‘ यह खेल भी उस ने खुद ही बनाया था. खेल में गांव के सभी हमउम्र बच्चे एक के पीछे एक खड़े होकर रेल के डब्बे बनते थे और इंजन का काम करता था खुद भात्ता.

बच्चों को उन की लंबाई के हिसाब से खड़ा किया जाता, जिस के चलते जो छोटे बच्चे जबरन खेल में घुसपैठ करते वे पीछे रह जाते. डब्बों के संयोजन के बाद षुरू होता था खेल.

भात्ता जोर से चीखता ‘बित्ति बांधै डोरडी‘ और हम सब पीछे पीछे बोलते ‘ठम्मा ठम, ठम्मा ठम‘ वेा यह बोलते ही भागना षुरू कर देता तो हम भी चाबी भरे रोबट से पीछे पीछे ठम्मा ठम, ठम्मा ठम कहते चल पड़ते. पूरे गांव का एक चक्कर, दो चक्कर, फिर तीन... और न जाने कितने ही चक्कर बच्चे लगा लेेते. जबरन घुसपैठ करने वाले जो छोटे बच्चे पीछे छूट जाते उन्हें आउट घोषित करते हुए घर जाने का आदेष दे दिया जाता, लेकिन जिद्दी बच्चे अगले चक्कर में फिर से घुसपैठ कर लेते.

सभी बच्चों में से अगर किसी के मुंह से गलती से भी गाली या कोई अपषब्द निकलता तो 2-3 दिन के लिए उसे भात्ता खेलों में षामिल नहीं करता था. दौड़ लगाने से लेकर कलाबाजी की कई तरह की प्रतियोगिताएं वह हमारे बीच करता ही रहता था.

भात्ता ही नही हम सब भी उस वक्त इस बात से दूर थे कि भात्ता अपने इस बेसिर पैर के खेल से हमारा षारीरिक विकास कर रहा था. इतना ही नहीं कई बार वह हमारे सामने कई अजीब से सवाल रख देता जिनके जवाब निकालने के लिए हम घंटों रेत पर उंगलियां घुमाते रहते थे, लेकिन जो जवाब उस से मिलता वह शायद ही कोई और दे पाता था.

लोग कहते थे कि भात्ता पागल है, लेकिन मेरी नजर में उस में दिमाग इफरात से था, जिस पर पागलपन का इफतरा लगा था. वरना नाना जी की हवेली की उस चोटी पर जिस पर बच्चों का जाना मना था, वह आसानी से न पहुंच पाता. वहां बंदरों के बीच षान से बैठकर वह हमारे लिए नए नए खेल कैसे बुन लेता था, मेरी समझ से यह आज भी परे है.

भात्ता के साथ मेरा कोई व्यक्तिगत जुडाव या संबंध नहीं था, लेकिन फिर भी न जाते क्यों मैं गांव जाते ही उसे ठूंठना शुरू कर देती. मेरी याद में उस से मेरे संवाद का कोई छुटपुट अंश भी होता, तो मैं उस पर पूरी कहानी लिख देती, लेकिन भात्ता की बातें सुनने के सिवाय मैंने शायद ही कभी उसे कुछ कहा हो.

पर मुझे भात्ता से स्नेह था. अगाध तो नहीं, पर स्नेह था जरूर. चाहे लेश मात्र ही हो... पर स्नेह की उपस्थिति जरूर थी. गांव से लोटने के पखवाड़े भरत बाद तक उस के साथ खेलने की ललक की भभक अकसर भीतर उठती थी. खैर, शहर की व्यस्त जीवनषैली में पहुंचते ही कब भात्ता गांव की सुनसान वनी में छिप जाता पता लगाना मुश्किल है.

जिंदगी के शायद 4-5 साल तक ही मैं उस का अनमोल सानिंध्य पा सकी। एक बार गांव जाने पर पता लगा कि वह किसी रात ट्रक के पीछे लटक कर जाने कहां चला गया. भात्ता पागलपन के इफतरे के साथ जाने कहां चला गया. आज जब घर पर बचपन की बात चली तो बचपन की यादों की हवेली से उस ने मुझे पुकार ही लिया. वह जोर जोर से कह रहा था ‘बित्ति बांधै डोरडी‘ और अनायास ही मेरे मुंह से निकल पड़ा ‘ठम्मा ठम, ठम्मा ठम‘

मैंने मम्मी से पूछा ‘‘ बित्ति बांधै डोरडी का मतलब क्या होता है.‘‘ उन की आंखों में एक अजीब सी चमक आ गई. उन्होंने मुस्कराते हुए कहां ‘‘भात्ता ?‘‘ उन के सवाल पर मैंने हां में सर हिला दिया.
‘‘ इस का कोई मतलब नहीं होता, वो पागल था. भला पागलों की बातों का भी कभी कोई मतलब होता है.‘‘ और वह उठकर चली गई.

लेकिन मैं जानती हूं इस बात का जरूर कोई अर्थ है। कोई गहरा अर्थ, जो ेषायद हम समझदारों के शब्दार्थ से परे है. शायद आप मुझे भी पागल समझे जो एक पागल की बातों में अर्थ को खोज रही है, पर इस पागलपन भरे अपनेपन की ही आज हम सब को जरूरत है. क्योंकि आज के इस दौर में जब अच्छे दिखने वाले लोग हमें दगा दे जाते हैं, तब उस समय का वह भोला भात्ता आज भी मेरे स्नेह से लबालब है, भले ही मुझ से दूर क्यों न हो।
बचपन का एक साथी जिसे लोग पागल कहते थे, यकायक यादों की अंधेरी कोठरी में टिमटिमाने लगा. मैं उस के विषय में कुछ ज्यादा तो नहीं जानती, लेकिन अपनी श्रृद्धा सुमन उस की यादों के पायदान पर अर्पित कर रही हूं. नहीं जानती कि वो इस वक्त कहां है, पर चाहती हूं कि जहां रहे खुष रहे...

अनीता शर्मा

4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत प्यारी याद बचपन की.. भत्ता पागल नहीं था.. उसे समझने वाला नहीं था कोई...

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  2. बचपन की बहुत सुंदर यादें होती हैं आपने बडी खूबसूरती से उकेरा है उन्हें. बहुत शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  3. कहानी और sansmarar का misrar dekhne को मिला. purani शैली में लिखा जाने वाला lekh अब prachlan से baher हो गया है. इस शैली को मीडिया वालो ने बरे अछ्ये ढंग से प्रयोग किया है. बाहरी लेखक अब बहुत कम मिलते हैं. कहानी और लेख को एक रूप में ढालना कठिन हैं कही कही पर मुहावरे का प्रोग हो सकता था जिसके चलते सब्दो में चार चाँद लग जाते. उसी तरह जिस तरह आज कल हिंदी में अग्रेजी का पुट देखने को मिलता है. फ़िलहाल अछे प्रयोग के लिया बधाई. लिखती रहिये और हम पाठको का स्वस्थ मनोरंजन करती रहें. ----राजीव matwala
    my Email-venimagazine.rediffmail.com
    my blog-www.venimagazine.blogspot.com

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  4. आपने बचपन की अपनी यादों के बहाने से हमें अपने बचपन की यादों की दुनिया में पहुँचा दिया, बहुत ही सजीव चित्रण,
    अतुल्यकीर्ति व्यास
    atulyakiri@gmail.com

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