गुरुवार, 1 अक्तूबर 2009

बगैर शीर्षक

रोज सुबह नहाधोकर पूजा करना, माथे के साथ ही थोड़ा सा सिंदूर अपनी मांग में बालों की ओट में ही कहीं लगा लेना. कुछ ऐसी ही चोरों जैसी शुरूआत होती है दिन की. यह सोचकर बहुत सकूं आता है कि जिसे समय से न छीन सकी कल्पना लोक में उस निर्मोही पर मेरा वश चलता है.
फिर भी भूल से जब लौट कर आती हूं अपने अस्तित्व की ओर, तो नजारा कुछ और ही होता है. मेरी नजर में सिंदूर महज लाल रेत है, जिसे हथियार बना कर पुरूष महिलाओं पर राज करना चाहते हैं. यह सोचकर ही अजीब लगता है कि एक मंगलसूत्र पहनने के लिए मेरे सर पर किसी पुरूष का हाथ होना जरूरी है. अरे भई, मैं नहीं मानती इन बातों को.
अगर मुझे मंगलसुत्र पसंद है, तो मैं बिना शादी के भी उसे पहन सकती हूं, क्यों किसी मर्द का मुंह तकूं....

फिर सहसा अपने भीतर ही कहीं पनप रहे विरोधाभास से डर जाती हूं. अगर मैं ऐसा ही सोचती हूं, तो क्यों मैंने खुद को इस लाल रेत के बंधन में बांध लिया है, क्यों उसे मांग मंे सजाने के बाद किसी की धुंधली सी सूरत मेरे मन को एक नर्म अहसास दे जाती है. क्यों मैं महज लाल रेत लगाने से यह सोच उठती हूं कि वह मेरा हुआ और मैं उस की. क्या उसे पाने के लिए एक यही रास्ता है मेरे सामने.

मेरे नारीवादी विचार उस समय अपने चरम पर होते हैं, जब मैं उस के बारे में नहीं सोचती। जब कभी घर पर मेरी शादी की बात चलती है, तो मैं जरा भी लचीलापन नहीं अपनाना चाहती. साफ कहती हूं कि शादी के बाद मैं कोई मंगलसूत्र या सिंदूर नहीं लगाउंगी, अपनी नौकरी नहीं छोडूंगी, रहूंगी तो वैसे जैसे मैं चाहती हूं.

हाल ही में एक रिश्ता आया, जिस में लड़का आर्मी में अच्छे पद पर था, लेकिन उन की मांग थी कि मैं अपनी नौकरी छोड़ कर लड़के के साथ रहूं. पैसे तो वो अच्छेे कमाता ही है, सो मुझे नौकरी की क्या जरूरत. मेरा एक ही जवाब था जितने पैसे लड़का कमाता है, मैं भी दिनरात एक करके उस से दोगुने कमा कर उस के हाथ में रखुंगी, बशर्ते वो अपनी नौकरी छोड़ कर घर संभाले. बस होना क्या था रिश्ता होते होते टूट गया. घर वालों के लिए यह एक सदमे से कम न था, लेकिन मेरे लिए तो मानो, विजयदश्मी का त्योहार हो.
खैर परेशानी मुझे कम से कम अपने इस व्यवहार या विचारो से तो कतई नहीं है, परेशान करने वाली वजह दूसरी है, जो मुझे कभी अपने होने का अहसास नहीं होने देती। उपर मैंने जितनी भी बातें कहीं, सभी उस समय धरी की धरी रह जाती हैं, जब बात उस शख्स की चलती है. न जाने मेरा आत्मसम्मान, मेरे विचार, मेरा अस्तित्व उस समय कहां गहरे गोते मारने चला जाता है। एक उसे पाने के लिए मैं सब कुछ कर सकती हूं, अपनी नौकरी छोड़ कर उस के परिवार की सेवा करना हो या मांग में सिंदूर और गले में मंगलसूत्र पहन दो गज का घूंघट निकाल घर में चुपचाप बैठना हो. मुझे ये सारी बातें उस समय सही लगने लगती हैं, क्यों, तो इस का जवाब मेरे पास भी नहीं है.

समझ नहीं पा रही कि मैं हकीकत में हूं क्या? वो पहली अनिता जो अपने अस्तित्व की सार्थकता के लिए किसी से भी भिड़ सकती है या किसी के लिए दीवानी एक बावरी सी लड़की जो सब कुछ भूला चुकी है....

13 टिप्‍पणियां:

  1. मेरा एक ही जवाब था जितने पैसे लड़का कमाता है, मैं भी दिनरात एक करके उस से दोगुने कमा कर उस के हाथ में रखुंगी, बशर्ते वो अपनी नौकरी छोड़ कर घर संभाल

    mat pahanna magal sootra,
    mat mang me lal ret lagana,
    agar me kar doon shuru घर संभालna,
    to kya man lengi aap mujhe apana sajana

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  3. अंतर्द्वंद भी क्या खूब बला है !!

    वैसे आपकी पोस्ट पढ़कर अच्छा लगा

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  4. तगड़ा अंतर्द्वंद है। लेकिन, ये भी सही है कि बहुत से साथी ऐसी भी इच्छा रखते अकसर मिल जाते हैं कि अगर कोई बढ़िया कमाऊ बीवी मिले तो, मैं घर मजे से चला लूं :)

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  5. किसी के लिए दीवानी एक बावरी सी लड़की hokar सब कुछ bhula dene mein koi buraee to nahin... aap jinse prem karte hain unken liye kisi bhi had tak ja sakte hain .

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  6. ऎसा होता ही है एक इंसान जो सारी दुनिया से अलग लगता है उसके लिये हम कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं। इसीलिये तो कहते हैं प्रेम अंधा होता है कुछ नही सोच पाता इंसान। किंतु फ़िर भी यह अंतर्द्वंद कैसा कि एक जिस सिंदूर को लगा कर आप किसी की सदा के लिये हो गई उसी को रेत कह पा रही हैं। हाँ यह ठीक है कि किसी ओर के बारे में सोच पाना ही मुश्किल होगा, मगर सिंदूर का महत्व आपने खुद बताया खुद को की वह आपके लिये कितना महत्वपूर्ण है जिसे माँग में सजा आप उसकी हो जाती हैं जो मिल नही पाया। समझ नही पा रही हूँ।

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  7. Anita I completely agree withen ur vision.

    even my wife doesn't wear sindoor or mangalsootra...
    they are really symbols of slavery
    @sunita ji...bhai aise me kisii kaa ho jaane ke liye purush kyon nahii lagaataa/pahanta kuch?

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  8. आप क्या हैं .. यह तलाश तो आपको खुद ही करनी पड़ेगी । और जीवन साथी वह होता है जो आपकी तरह सोचता हो । मैने विवाह के बाद पहले ही दिन अपने माता-पिता के सामने अपनी पत्नी से कहा था सिन्दूर से त्वचा खराब होती है और मंगल्सूत्र गुलामी का प्रतीक है तथा घूँघट से movement मे कठिनाई होती है । मै इन्हे आदेशात्मक स्वर मे भी कह सकता था ऐसा ऐसा मत करो .. लेकिन वह भी एक पुरुष का अहं ही होता ,जिसका मै सदा से विरोध करता आया हूँ ।

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  9. अनिताजी,
    ये सारी चीजे कहलो या बाते, हमारे पुराने संस्कारों से आती है ! अंग्रेज महिलाए भी तो है, वो भी न कुछ लगाती है न पहनती है, मगर एक बात जरूर कहूंगा कि कुछ समय का भी असर होता है ! मेरे एक जानने वाले है, पिछले ३८ सालो से कनाडा में रह रहे है, जब भी इंडिया आये, बस वही पश्चिमी परिधान मैंने हमेशा उनपर देखा, अब करीब ६३-६४ साल की है पिछली बार जब देखा तो दंग रह गया ! विशुद्ध भारतीय परिधान और मांग में सिन्दूर ! तो क्या यह समझू कि अब जाकर इन्हें अक्ल आयी, अथवा यह कहू कि सठिया गई ? एक हास्य कवी की वह बात यद् आ रही है कि पश्चिम में अंग्रेज लोग (पति-पत्नी) दिनभर में इंतनी बार एक दुसरे से आलिंगन होते है, किस करते है कि जल्दी उनका किस(चुम्बन ) का कोटा ख़त्म हो जाता है, और रिश्ते टूट जाते है ! यहाँ अपने देश में एक तो किसे किफायत के खर्च की जाती है और ऊपर से ये लाल रेट और सूत्र शायद दोनों को यह सोचने पर मजबूर कर देता है कि उनका कोई चीज निभाने का वचन ले रहा है !
    खैर, मेरी बात को हलके में ही ले, ..........इस उम्र में अक्सर सभी बहक जाते है.......!!

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  11. अनीता जी,
    आपका अंतर्द्वंद लाजिमी है ...खुद की पहचान छोड़ना आसान नहीं है....ख़ास करके अगर आप सक्षम हैं...दूसरी बात आपके आस-पास का माहौल कैसा है इस पर भी निर्भर करता है...मैं कनाडा में रहती हूँ अगर में पूरी मांग सिन्दूर से भर कर ऑफिस जाऊं तो दस लोग टोक देंगे ''You are bleeding'' इसलिए सिन्दूर पहनना बेवकूफी है यहाँ ...लेकिन इंडियन के समारोहों में ये बहुत अच्छा लगता है, और याद दिलाता है अपने संस्कारों और संस्कृति की .......
    एक सलाह और देना चाहूंगी ...मानना न मानना आप पर है "कुछ भी हो जाए नौकरी नहीं छोड़ना" दूसरा पति शायद मिल भी जाएगा लेकिन नौकरी कभी नहीं और अंत में नौकरी ही काम आती हैं और कोई नहीं.....कभी-कभी जब बुरा वक्त आता है चाह कर भी कोई काम नहीं आ पाते...

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  12. Aapke dwara likhi baton ke prati virodh darz karana mera maksad katai nhi hai. Sindoor ya mangalsutra ko suhag ki nishani kha gya hai, Par jo hazrat kah rahe hain ki sindoor aur mangalsutra gulami ke parichayak hain unse main khas ittefaq nhi rakhta. Han ye aapki apni marzi hai ki aap inka istemal karen ya nhi. Kisi par inhe thopna sarvtha anuchit hai. Gulami ke parichayak sindoor ya mangalsutra nhi ho sakte wo to Purush aur stri ki mansikta hai jo unhe gulam ya swatantra banati hai. Rah gai bat noukari chodne ki, to main ek purush hun aur yadi main kabhi kisi ko pyar karunga to main kabhi nhi chahunga ki wo atmnirbhar na ho; aur yadi kabhi is tarah ka balidan dena pada to wo stri aur purush ke aapsi nirnay par nirbhar hona chahiye. Sath rahne ya dur rahne se khi adhik mahtvapurn hoga ek dusre ke hokar rahna; aane wali pidhi ke bhavishya ko sunishchit karna. Ye ahankar ka nhi samanjasya aur vivek ka vishay hai.

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