शनिवार, 10 अक्तूबर 2009

यह पीड़ामयी बयार

बह चली है कैसी,
पीड़ामयी यह बयार,
जो बुनती रहती है,
विपुल क्रन्दन अपार,
अनायास ही दे जाती है
अनचाहे मुझको
अश्रु उत्स उधार,
प्रणय का तुम्हारा चुंबन
मेरी स्मृति बराए जूं आहार,
हाय, नेस्ती छाई है
बन जीवन विहास.
उसकी वाय में घुलना तुम्हारा
ए मेरे अवरुद्ध श्वास,
आज भी दे रहा है मुझे
वही मिश्रित सा अहसास।
तुम ही कहो अब
प्रयण का वह पल,
कैसे भूलूं मैं
बन पलाश.
देखो तो,
तुम्हारा वह भोगी स्पर्श,
नित करता है मुझसे अट्टहास।
अनीता शर्मा

8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर रचना । आभार

    ढेर सारी शुभकामनायें.

    SANJAY
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  2. तुम ही कहो अब
    प्रयण का वह पल,
    कैसे भूलूं मैं
    वाकई कुछ लम्हे भूलने के लिये नही होते
    बहुत सुन्दर रचना

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  3. सुंदर कविता...

    हर शब्द प्रणय-संबंधों और उससे उपजी मीठी मीठी पीड़ा को ब्यां कर रहा है ।

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  4. kuchh khas nahi hai...
    mehnat karo
    auraten prashansha ki bhukhi hoti hai...
    purush chaplushi karne me pichhe nahi rahte..
    tumhare post or uspe chhape comment ko dekh ke ye purani bat fir se proof hoti hai..

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  5. तुम ही कहो अब
    प्रयण का वह पल,
    कैसे भूलूं मैं
    बन पलाश.



    BEHATAR LEKHAN

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  6. कैसे भूलूं मैं
    वाकई कुछ लम्हे भूलने के लिये नही होते
    बहुत सुन्दर रचना

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